मेरा हर ख्वाब तुमसे है । ख़्वाबों में तुझे ही हर रोज पाता हूँ ।
.....और तुम गुमसुम बैठी हो । ये ठीक नही है ....अब मुस्कुरा भी दो ।
मुझे अच्छा लगेगा ।
तुझे देख कर ही तो ख्वाब बुनता हूँ । कैसे तोड़ दूँ ?
ख़्वाबों में ही तुझे तराशा है । कड़ी मेहनत से एक मूरत बनी है ।
कैसे छोड़ दूँ ?
तेरी चमकीली आँखें ...मेरे सपनों की बुनियाद है ।
अब आ जाओ ...देर न करो । ये ठीक नही है ।
Tuesday, June 2, 2009
Monday, May 11, 2009
लेखन का आनंद
लेखन का आनंद ही अलग है । यहाँ दूसरों पर बहुत कम निर्भरता है । यहाँ बाजार कम, रचनाकार ज्यादा तय करता है । बाजार और लेखन में कोई सामंजस्य नही हो सकता ....अगर बिठाने की कोशिश की गई तो लेखन का विकृत रूप देखने को मिलेगा ।
लेखन तो प्रकृति के काफी निकट है । बाजार में नही मिल सकता । यह तो प्रकृति के गोद में ही मिलेगा ।
लेखन में आजादी है ...सोचने की , कुछ अलग करने की और कुछ नया लिखने की । निश्चित रूप से अपने आप को पहचानने की संभावना भी यही छुपी हुई है ।
मन में आता है किसी पर्वत की चोटी पर बैठ कर दुनिया भर के अनोखे लोगों के लिए कुछ लिखूं । आजादी और रचनात्मकता को गले लगाऊं । बर्फ , झरने और नदियों को ई मेल कर नेचर के निकट जाऊं ।
अभी तो बहुत अनुभव लेने है । लेखन का दशमलव भी नही जानता । पर्वत की चोटी पर जाना तो दूर की बात है । भरोशा है ...चोटी पर न सही कुछ आगे तो जरुर जाऊँगा ।
लेखन तो प्रकृति के काफी निकट है । बाजार में नही मिल सकता । यह तो प्रकृति के गोद में ही मिलेगा ।
लेखन में आजादी है ...सोचने की , कुछ अलग करने की और कुछ नया लिखने की । निश्चित रूप से अपने आप को पहचानने की संभावना भी यही छुपी हुई है ।
मन में आता है किसी पर्वत की चोटी पर बैठ कर दुनिया भर के अनोखे लोगों के लिए कुछ लिखूं । आजादी और रचनात्मकता को गले लगाऊं । बर्फ , झरने और नदियों को ई मेल कर नेचर के निकट जाऊं ।
अभी तो बहुत अनुभव लेने है । लेखन का दशमलव भी नही जानता । पर्वत की चोटी पर जाना तो दूर की बात है । भरोशा है ...चोटी पर न सही कुछ आगे तो जरुर जाऊँगा ।
Wednesday, May 6, 2009
मत्स्य पुराण में लिंग पूजा का उल्लेख मिलता है ......
अरबों ने अंक पद्धति भार्वासियों से सिखा ।
मत्स्य पुराण में लिंग पूजा का उल्लेख मिलता है ।
कालिदास शिवोपासक थे ।
भारवि ने अपने महाकाव्य किरातार्जुनीय में अर्जुन और शिव के बिच युद्ध का वर्णन किया है ।
वाकातक शासक प्रवार्शें द्वितीय को सेतुबंध नामक कृति का रचयिता माना जाता है ।
कनिष्क के दरबार में पार्श्व ,वसुमित्र और अश्वघोष जैसे विद्वान् थे ।
मेगास्थनीज के अनुसार मौर्य काल में बिक्री कर नही देने वाले को मृत्यु दंड मिलता था ।
बौध धर्म के अनुसार महापरिनिर्वान मृत्यु के बाद ही संभव है ।
मत्स्य पुराण में लिंग पूजा का उल्लेख मिलता है ।
कालिदास शिवोपासक थे ।
भारवि ने अपने महाकाव्य किरातार्जुनीय में अर्जुन और शिव के बिच युद्ध का वर्णन किया है ।
वाकातक शासक प्रवार्शें द्वितीय को सेतुबंध नामक कृति का रचयिता माना जाता है ।
कनिष्क के दरबार में पार्श्व ,वसुमित्र और अश्वघोष जैसे विद्वान् थे ।
मेगास्थनीज के अनुसार मौर्य काल में बिक्री कर नही देने वाले को मृत्यु दंड मिलता था ।
बौध धर्म के अनुसार महापरिनिर्वान मृत्यु के बाद ही संभव है ।
Friday, May 1, 2009
विटामिन सी और विटामिन डी
स्कर्वी रोग विटामिन-c की हीनता से होता है ।
इस विटामिन को एस्कोर्बिक अम्ल कहते है ।
मसूडों में खून आना , पेशियों तथा जोडो में दर्द के साथ दुर्बलता इसके प्रमुख लक्षण है ।
शारीरिक भार में कमी हो जाती है और घाव भी जल्द नही भरता है ।
निम्बू , संतरा ,अनन्नास , अंगूर ,पालक हरी मिर्च में विटामिन-c के प्रमुख स्रोत है ।
विटामिन-c की गोली के सेवन से भी स्कर्वी पर काबू पाया जा सकता है ।
विटामिन डी की कमी से रिकेट्स नामक रोग होता है ।
हमारी त्वचा में विटामिन डी का संश्लेषण सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होता है ।
विटामिन डी के अभाव में कैल्सियम आयन की मूत्र के साथ अत्यधिक हानि होती है ।
विटामिन डी की कमी से बच्चों में रिकेट्स तथा बड़ों में ओस्तियोमालेसिया नामक बिमारी होती है ।
रिकेट्स को सुखा रोग भी कहते है ।
बच्चों की टाँगे धनुष के आकार की हो जाती है । पसलियों के आकार में परिवर्तन के कारण बच्चों का वक्ष कबुतर्नुमा हो जाता है ।
काड लीवर तेल , मछली , दूध , अंडे की जर्दी प्रमुख स्रोत है ।
इस विटामिन को एस्कोर्बिक अम्ल कहते है ।
मसूडों में खून आना , पेशियों तथा जोडो में दर्द के साथ दुर्बलता इसके प्रमुख लक्षण है ।
शारीरिक भार में कमी हो जाती है और घाव भी जल्द नही भरता है ।
निम्बू , संतरा ,अनन्नास , अंगूर ,पालक हरी मिर्च में विटामिन-c के प्रमुख स्रोत है ।
विटामिन-c की गोली के सेवन से भी स्कर्वी पर काबू पाया जा सकता है ।
विटामिन डी की कमी से रिकेट्स नामक रोग होता है ।
हमारी त्वचा में विटामिन डी का संश्लेषण सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होता है ।
विटामिन डी के अभाव में कैल्सियम आयन की मूत्र के साथ अत्यधिक हानि होती है ।
विटामिन डी की कमी से बच्चों में रिकेट्स तथा बड़ों में ओस्तियोमालेसिया नामक बिमारी होती है ।
रिकेट्स को सुखा रोग भी कहते है ।
बच्चों की टाँगे धनुष के आकार की हो जाती है । पसलियों के आकार में परिवर्तन के कारण बच्चों का वक्ष कबुतर्नुमा हो जाता है ।
काड लीवर तेल , मछली , दूध , अंडे की जर्दी प्रमुख स्रोत है ।
Wednesday, April 29, 2009
एक सपने के टूट जाने से जिंदगी ख़त्म नही हो जाती......
जीवन एक संगिनी की तरह है । हमेशा आपके साथ । राह में हर मोड़ पर कदम मिलाते हुए ।
कुछ ख़त्म हो गया तो क्या हुआ । बहुत कुछ अभी बाकी है , मेरे दोस्त .....कहाँ खो गए ।
दोस्त ! एक सपने के टूट जाने से जिंदगी ख़त्म नही हो जाती । बहुत से सपने अभी भी बुने
जा सकते है । टूटने दो यार एक सपने को ..वह टूटने के लिए ही था ।
हर शाम के बाद सुबह , हर सुबह के बाद शाम । यह तो प्रकृति का नियम है । अभी शाम है ...
मेरे दोस्त । सुबह का इन्तजार करो । आनेवाला ही है । फ़िर डर कैसा ? जम कर करो ,इन्तजार ।
क्या कहू दोस्त ....जीवन में अँधेरा भी तो जरुरी है । तभी तो उजाले का प्रश्फुटन होगा ।
अंधेरे के बाद का उजाला ज्यादा मीठा होता है । चख कर तो देखो ।
कुछ ख़त्म हो गया तो क्या हुआ । बहुत कुछ अभी बाकी है , मेरे दोस्त .....कहाँ खो गए ।
दोस्त ! एक सपने के टूट जाने से जिंदगी ख़त्म नही हो जाती । बहुत से सपने अभी भी बुने
जा सकते है । टूटने दो यार एक सपने को ..वह टूटने के लिए ही था ।
हर शाम के बाद सुबह , हर सुबह के बाद शाम । यह तो प्रकृति का नियम है । अभी शाम है ...
मेरे दोस्त । सुबह का इन्तजार करो । आनेवाला ही है । फ़िर डर कैसा ? जम कर करो ,इन्तजार ।
क्या कहू दोस्त ....जीवन में अँधेरा भी तो जरुरी है । तभी तो उजाले का प्रश्फुटन होगा ।
अंधेरे के बाद का उजाला ज्यादा मीठा होता है । चख कर तो देखो ।
Wednesday, April 22, 2009
पृथ्वी दिवस का मजाक ....
२२ अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया गया । हर साल इसी दिन को मनाया जाता है । पृथ्वी को बचाने की तरकीब बनाई जाती है । लोगो में जागरूकता फैलाई जाती है । कई कार्यक्रम होते है । बंद कमरों में पृथ्वी की स्थिति पर चर्चा होती है । सेमिनारों में जानकार लोग जीवन को बचाने सम्बंधित बड़ी बड़ी बातें करते है । ये बातें २३ अप्रैल को भुला दी जाती है और फ़िर अगले २२ अप्रैल का इन्तजार शुरू हो जाता है ।
पृथ्वी दिवस भी होली , दिवाली ,दशहरा जैसे त्योहारों की तरह खुशी का दिन और खाने पिने का दिन मान कर मनाया जाने लगा है । इसके उद्देश्य को लोग केवल उसी दिन याद रखते है । बल्कि मै तो कहुगा की घडियाली आंसू बहाते है । हमें इस बात का अंदाजा नही है की कितना बड़ा संकट आने वाला है और जब पानी सर से ऊपर चला जायेगा तो चाहकर भी कुछ नही कर सकते , अतः बुद्धिमानी इसी में है की अभी चेत जाए ।
वैश्विक अतर पर पर्यावरण को बचाने की मुहीम १९७२ के स्टाकहोम सम्मलेन से होती है । इसी सम्मलेन में पृथ्वी की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई और हरेक साल ५ जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने पर सहमती व्यक्त की गई । १९८६ के मोंट्रियल सम्मलेन में ग्रीन हाउस गैसों पर चर्चा की गई । १९९२ में ब्राजील के रियो दे जेनेरियो में पहला पृथ्वी सम्मलेन हुआ जिसमे एजेंडा २१ द्वारा कुछ प्रयास किए गए । इसी सम्मलेन के प्रयास से १९९७ में क्योटो प्रोटोकाल को लागू करने की बात कही गई । इसमे कहा गया की २०१२ तक १९९० में ग्रीन हाउस गैसों का जो स्तर था , उस स्तर पर लाया जायेगा । अमेरिका की बेरुखी के कारण यह प्रोटोकाल कभी सफल नही हो पाया । रूस के हस्ताक्षर के बाद २००५ में जाकर लागू हुआ है । अमेरिका अभी भी इसपर हस्ताक्षर नही किया है । यह रवैया विश्व के सबसे बड़े देश का है , जो अपने आपको सबसे जिम्मेदार और लोकतांत्रिक देश बतलाता है । वह कुल ग्रीन हाउस गैस का २५%अकेले उत्पन्न करता है ।
अगर ऐसा ही रवैया बड़े देशो का रहा तो पृथ्वी को कोई नही बचा सकता । जिस औद्योगिक विकास के नाम पर पृथ्वी को लगातार लुटा जा रहा है , वे सब उस दिन बेकार हो जायेगे जब प्रकृति बदला लेना आरम्भ करेगी ।
पृथ्वी दिवस भी होली , दिवाली ,दशहरा जैसे त्योहारों की तरह खुशी का दिन और खाने पिने का दिन मान कर मनाया जाने लगा है । इसके उद्देश्य को लोग केवल उसी दिन याद रखते है । बल्कि मै तो कहुगा की घडियाली आंसू बहाते है । हमें इस बात का अंदाजा नही है की कितना बड़ा संकट आने वाला है और जब पानी सर से ऊपर चला जायेगा तो चाहकर भी कुछ नही कर सकते , अतः बुद्धिमानी इसी में है की अभी चेत जाए ।
वैश्विक अतर पर पर्यावरण को बचाने की मुहीम १९७२ के स्टाकहोम सम्मलेन से होती है । इसी सम्मलेन में पृथ्वी की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई और हरेक साल ५ जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने पर सहमती व्यक्त की गई । १९८६ के मोंट्रियल सम्मलेन में ग्रीन हाउस गैसों पर चर्चा की गई । १९९२ में ब्राजील के रियो दे जेनेरियो में पहला पृथ्वी सम्मलेन हुआ जिसमे एजेंडा २१ द्वारा कुछ प्रयास किए गए । इसी सम्मलेन के प्रयास से १९९७ में क्योटो प्रोटोकाल को लागू करने की बात कही गई । इसमे कहा गया की २०१२ तक १९९० में ग्रीन हाउस गैसों का जो स्तर था , उस स्तर पर लाया जायेगा । अमेरिका की बेरुखी के कारण यह प्रोटोकाल कभी सफल नही हो पाया । रूस के हस्ताक्षर के बाद २००५ में जाकर लागू हुआ है । अमेरिका अभी भी इसपर हस्ताक्षर नही किया है । यह रवैया विश्व के सबसे बड़े देश का है , जो अपने आपको सबसे जिम्मेदार और लोकतांत्रिक देश बतलाता है । वह कुल ग्रीन हाउस गैस का २५%अकेले उत्पन्न करता है ।
अगर ऐसा ही रवैया बड़े देशो का रहा तो पृथ्वी को कोई नही बचा सकता । जिस औद्योगिक विकास के नाम पर पृथ्वी को लगातार लुटा जा रहा है , वे सब उस दिन बेकार हो जायेगे जब प्रकृति बदला लेना आरम्भ करेगी ।
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मार्कंडेय राय
Tuesday, April 21, 2009
हमारे अलावा इस ब्रह्मांड में कही और जीवन है ???
आकाश को देख रहा हूँ । कोई छोर नही दीखता । इतना फैला हुआ है ...... डर लग लगता है ।
सोचता हूँ । हमारे अलावा इस ब्रह्मांड में कही और जीवन है ???
अगर नही तो रोंगटे खड़े हो जाते है । इतने बड़े ब्रह्माण्ड में हम अकेले है !विश्वास नही होता ...लगता है , कोई तो जरुर होगा ।
फ़िर सोचता हूँ । आकाश को इतना फैला हुआ नही होना चाहिए । कुछ तो बंधन जरुरी है । भटकने का डर लगा रहता है ।
सुना है पृथ्वी गोल है । हो सकता है , ब्रह्माण्ड भी गोल हो । किसे पता ?? भाई हमारी भी तो एक सीमा है । सबकुछ नही जान सकते । कुछ दुरी तक ही भाग दौड़ कर सकते है । भाग दौड़ करते रहे । इसी का नाम तो जीवन है । इतना सलाह जरुर देना चाहुगा की सबकुछ जानने के चक्कर में न पड़े । यह एक बेकार की कवायद है । इस राह पर चल मंजिल को पाना तो दूर की बात है , खो जरुर देगे ।
इधर ये भी सुनने में आया है की एक क्षुद्र ग्रह पृथ्वी से टकराने वाला है ...शायद २०२८ में !
यह सनसनी है या हकीकत नही पता ।
अगर सनसनी है ...तो है ..पर वास्तव में ऐसा है तो परीक्षा की घड़ी आ गई है ...
इस खबर को सुनकर सुमेकर लेवी वाली घटना याद आती है , जब मै बच्चा था । सुमेकर बृहस्पति से जा टकराया था । यह घटना १९९४ की है । उस समय ऐसी ख़बर सुन डर गया था ।
देखते है ...२०२८ में क्या होता है .......
सोचता हूँ । हमारे अलावा इस ब्रह्मांड में कही और जीवन है ???
अगर नही तो रोंगटे खड़े हो जाते है । इतने बड़े ब्रह्माण्ड में हम अकेले है !विश्वास नही होता ...लगता है , कोई तो जरुर होगा ।
फ़िर सोचता हूँ । आकाश को इतना फैला हुआ नही होना चाहिए । कुछ तो बंधन जरुरी है । भटकने का डर लगा रहता है ।
सुना है पृथ्वी गोल है । हो सकता है , ब्रह्माण्ड भी गोल हो । किसे पता ?? भाई हमारी भी तो एक सीमा है । सबकुछ नही जान सकते । कुछ दुरी तक ही भाग दौड़ कर सकते है । भाग दौड़ करते रहे । इसी का नाम तो जीवन है । इतना सलाह जरुर देना चाहुगा की सबकुछ जानने के चक्कर में न पड़े । यह एक बेकार की कवायद है । इस राह पर चल मंजिल को पाना तो दूर की बात है , खो जरुर देगे ।
इधर ये भी सुनने में आया है की एक क्षुद्र ग्रह पृथ्वी से टकराने वाला है ...शायद २०२८ में !
यह सनसनी है या हकीकत नही पता ।
अगर सनसनी है ...तो है ..पर वास्तव में ऐसा है तो परीक्षा की घड़ी आ गई है ...
इस खबर को सुनकर सुमेकर लेवी वाली घटना याद आती है , जब मै बच्चा था । सुमेकर बृहस्पति से जा टकराया था । यह घटना १९९४ की है । उस समय ऐसी ख़बर सुन डर गया था ।
देखते है ...२०२८ में क्या होता है .......
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