विकलांगों के हितों की रक्षा के लिए भारत में 1995 में विकलांगता कानून बना था।
भारत साल 2007 में यूएन के विकलांग अधिकार संबंधी करार (यूएनसीआरपीडी) का हिस्सा बना। वर्ष 1999 में वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित पॉलिसी बनी थी। लेकिन बदलती डेमोग्रैफी को देखते हुए इस पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस की जा रही थी। इसके लिए मोहिनी गिरी की अध्यक्षता में गठित एक कमेटी की रिपोर्ट में बुजुर्ग महिलाओं व अस्सी साल से ऊपर के लोगों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है। इसी के मद्देनजर वित्त मंत्री ने इस बजट में पेंशन स्कीम में उनको कुछ रिलीफ देने की कोशिश की है। राज्यों में माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण कानून को अमल में लाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। पहली अक्टूबर 2011 को बुजुर्गों के स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया गया है.
कहने को तो ..... नीला आसमान मेरे चारो तरफ़ लहरा रहा है । पर मेरे लिए एक मुठ्ठी भर भी नही बचा ।
चाहत तो एक मुठ्ठी भर आसमाँ की ही थी । वह भी मुअस्सर नही ।
सूरज की किरणे मुझ पर भी वैसे ही पड़ती है , जैसे दूसरो पर गिरती है । अफ्शोश !मुझमे गर्मी पैदा करने की
ताकत उसमे नही ।
कौन जानता ...मै वह अन्धकार बन गया हूँ , जिसपर उजाले का कोई असर नही ।
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने 16 वर्ष की उम्र में ही अपनी पहली पुस्तक 'काकली' लिखी थी.
वर्ष 1916 में गया के मैरवा में जन्मे शास्त्री ने मुजफ्फरपुर को अपनी कर्मस्थली बनाया. उनका आवास निराला निकेतन हिन्दी प्रेमियों का तीर्थ बना रहता था. आचार्य की मुख्य रचनाओं में रूप-अरूप, तीर-तरंग, शिप्रा, मेघ गीत, अवंतिका, धूप दुपहर की के अलावा दो तिनकों का घोंसला और एक किरण : सौ झाइयां काफी प्रसिद्ध रही। उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखा . हम इस महान आत्मा के जाने बड़े व्याकुल और बेचैन है . आईये हम सब मिलकर उन्हें श्रधांजलि देते है .
जम्मू और कश्मीर की लोकतान्त्रिक और निर्वाचित संविधान-सभा ने 1957 में एकमत से 'महाराजा द्वारा कश्मीर के भारत में विलय के निर्णय' को स्वीकृति दे दी और राज्य का ऐसा संविधान स्वीकार किया जिसमें कश्मीर के भारत में स्थायी विलय को मान्यता दी गयी थी ।पकिस्तान ने कभी भी पाक अधिकृत कश्मीर को खाली नहीं किया जिससे की वहां पर जनमत संग्रह हो सके .आजादी मिलने के कुछ दिन बाद ही पाकिस्तान में कबायलियों के भेष में अपनी सेना कश्मीर में भेज दिया यह कश्मीर को हडपने का उसका एक कुटिल प्रयास था .
कुछ ख़ास नही ....साधारण आदमी ......जो अपने को जानने की कोशीश कर रहा है । कुछ हद तक परेशान है ....नए रास्ते खोज रहा .....उसी क्रम में भारतीय प्रशासनिक सेवा का साक्षात्कार भी दिया । लिखने में मन लगता है ....... कुछ नया करना चाहता है ......जहाँ बाजारवाद न हो । ......जिंदगी अभावों में कट रही है .......इसका भी लुत्फ़ उठाता है ......सोचता है ....दुनिया से दो कदम पीछे रह गया .....पर कोई मलाल नही । लेखन का शायद दशमलव भी नही जानता पर ......हाथ मार रहा ....कोई राह नही दिखा पर .....चलते जा रहा है....