दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री और भारत कोकिला लता मंगेशकर की बहन आशा भोसले की राहें आसान नहीं थीं। शुरू में उन्हें बी व सी ग्रेड की फिल्में ही मिलीं। उनके करियर में मील का पत्थर साबित हुई फिल्म नया दौर। इसके बाद तो उनकी आवाज का जादू कुछ ऐसा छाया कि आज तक लोग उसमें बंधे हैं। वह जितनी गहराई से भजन गा सकती हैं, उतनी ही नजाकत से गजलें भी। ओ.पी. नैय्यर, खय्याम, सचिन देव बर्मन, आर.डी. बर्मन, जयदेव, शंकर जयकिशन, इलैया राजा, ए.आर. रहमान जैसे दिग्गज संगीत निर्देशकों के साथ उन्होंने काम किया। वह पहली भारतीय गायिका थीं, जिन्हें ग्रैमी अवॉर्ड के लिए नामांकित किया गया।
कुछ समय पूर्व दिल्ली में 23वें गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अवॉर्ड समारोह में शिरकत करने आई आशा जी ने भावुक होकर कहा कि यह अवॉर्ड पाकर उन्हें लग रहा है कि वह विश्वस्तरीय गायिका हो गई हैं। हालांकि उन्हें मालूम था कि वही सबसे ज्यादा गीत रिकॉर्ड करने वाली गायिका हैं, लेकिन वह चुप रहीं। उन्होंने कहा कि जब तक उनकी सांसें चलेंगी, वह गाती रहेंगी। हालांकि आधुनिक संगीत की आलोचना करने से वह नहीं चूकीं। उन्होंने कहा कि यह बिना रूह के इंसान जैसा है। आशा को उनके चाहने वाले आने वाले दिनों में ऐक्टिंग के फील्ड में भी देखेंगे।
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उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जन्मी बछेंद्री पाल के दिल में पहली बार पर्वतारोहण का जज्बा तब जगा, जब उन्होंने स्कूल की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में 400 मीटर की चढाई की। इसके बाद उन्होंने नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से प्रशिक्षण लिया। पहली बार 1984 में भारत के चौथे माउंट एवरेस्ट चढाई में हिस्सा लिया। इससे पहले पूरी दुनिया में चार स्त्रियां ही इसे फतह करने में कामयाब हुई थीं।
अभी वह जमशेदपुर में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के एडवेंचर अभियान की प्रमुख हैं। इसके तहत भारत सहित विश्व के कई देशों में माउंटेनियरिंग अभियान आयोजित किए जाते हैं। कहती हैं बछेंद्री, अभियान से जुडना बडा तोहफा है मेरे लिए। अब तो स्त्रियां भी बडी संख्या में माउंटेनियरिंग के लिए प्रेरित हो रही हैं। साल में एक बार उनके लिए अभियान चलाए जाते हैं। कोशिश होती है कि हर जगह की स्त्रियां शामिल हों। वह फिर कहती हैं, नेचर एक विशाल क्लासरूम है, जहां सीखने का कोई अंत नहीं है। हम अभी लीडरशिप स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम चला रहे हैं। बेस कैंप उत्तरकाशी में है।
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दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा के बाद अपराजिता ने जर्नलिज्म व फिल्ममेकिंग का कोर्स किया। स्त्रियों के आर्थिक सशक्तीकरण विषय पर काम करते हुए लगा कि वह यही काम करना चाहती हैं। इसके बाद एक एनजीओ में काम किया तो पता चला कि भारत में प्रसव के दौरान हर साल 60-70 हजार स्त्रियों की मौत हो जाती है और इस तरह व्हाइट रिबन एलाइंस का गठन किया गया।
कहती हैं अपराजिता, स्त्रियों की सेहत चिंतनीय मुद्दा है। इसके दो कारण हैं, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और लिंगभेद। जहां ज्यादा जरूरी है वहां स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी ओर लडकी को बचपन से सही पोषण नहीं दिया जाता। आंकडे बताते हैं कि विश्व की 20 प्रतिशत प्रसव संबंधी मौतें सिर्फ भारत में होती हैं। इसके बावजूद यह बडा मसला नहीं है। गोगोई कहती हैं, अगर मां को ही सही पोषण नहीं मिलेगा तो बच्चे कैसे स्वस्थ रहेंगे! जरूरत है कि इन मुद्दों पर दुगनी मेहनत की जाए, सोशल साइट्स के जरिये मुहिम जगाई जाए। स्त्री शिक्षा के लिए काम किया जाए और इसकी मुहिम जगाए हमारा युवा वर्ग। केरल में जहां सौ फीसदी साक्षरता है, वहां स्त्री स्वास्थ्य का स्तर भी ठीक है। इस मुद्दे पर सभी को आगे आना होगा, तभी थोडी सफलता की उम्मीद की जा सकती है।
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हिंदी सिनेमा में शबाना एक क्रांति का नाम है। समर्थ कलाकार के अलावा वह कर्मठ कार्यकर्ता भी हैं। 1988 में पद्मश्री के बाद हाल ही में उन्हें पद्मभूषण से नवाजा गया है। पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट से अभिनय की बारीकियां सीखीं और पहली ही फिल्म अंकुर (1974) से उन्होंने जाहिर कर दिया कि किसी परिपाटी का अनुसरण नहीं करने वाली हैं। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। निशांत, शतरंज के खिलाडी, स्पर्श, अर्थ, मासूम, मंडी, खडंहर, पार जैसी सफल फिल्में उनकी झोली में हैं। उन्हें पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल हुए।
वह झुग्गी झोपडी के हक में लडने वाली संस्था निवारा हक सुरक्षा समिति की सदस्य बनीं। 1986 में कोलाबा की 25 वर्ष पुरानी झुग्गी-झोपडी को बचाने के लिए भूख हडताल पर बैठीं। दिल्ली के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में जब उन्हें पहली अंग्रेजी फिल्म के प्रीमियर पर बोलने को कहा गया, तो वह नाट्यकर्मी सफदर हाशमी की खुलेआम हत्या पर बोलीं। वह वर्ष 1997 में राज्य सभा की सदस्य रहीं।
वह मशहूर शायर स्व.कैफी आजमी की बेटी व गीतकार जावेद अख्तर की पत्नी हैं। कैफी के देहांत के बाद वह उनकी संस्था मिजवां वेलफेयर सोसायटी के कार्यो को वह आगे बढा रही हैं। इसके तहत वह लडकियों को सिलाई-कढाई की ट्रेनिंग दे रही हैं। शबाना कहती हैं, मैं हमेशा सही समय पर सही स्थान पर रही। फिल्मों में आई तो समानांतर सिनेमा की शुरुआत हुई। फिर सही समय पर हॉलीवुड का रुख किया और अब मैं ऐसे माहौल में हूं, जहां उम्र की कोई बंदिश नहीं है।
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संयुक्त राष्ट्र में गरीबी दूर करने पर चल रही बहस में जब भारत के ग्राम सरपंच के बोलने की बारी आई तो यू.एन. के सदस्यों को लगा कि साडी पहनी हुई कोई संकोची सी युवती होगी, लेकिन जब जींस-टॉप में छवि राजावत उनसे मुखातिब हुई तो विदेशियों के मुंह खुले रह गए। उनके सामने खडी वह सरपंच तो बॉलीवुड ऐक्ट्रेस सी दिख रही थी। कभी वह क्रिकेट खेलती दिखती हैं तो कभी विकास कार्यो का जायजा लेती।
छवि ने ग्रामीण भारत की बदली तसवीर पेश की है दुनिया के सामने। एयरटेल के सीनियर मैनेजमेंट का हिस्सा रही छवि को कॉरपोरेट ग्लैमर और शहरी जीवन बांध नहीं सका। टोंक जिले के छोटे से गांव सोढा की राजपूत बाईसा हैं छवि। जब गांव वालों ने उनसे चुनाव लडने को कहा तो उन्होंने हाई प्रोफाइल करियर त्याग दिया। वह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की बैठकों में हिस्सा लेती हैं और दुनिया के मंच पर भारतीय गांवों का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह रणनीति के तहत विकास-कार्य करती हैं। गांव वाले कहीं गलत हों तो उन्हें डांटने से भी नहीं चूकतीं। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग व सामाजिक बदलाव की लडाई लडना चाहती हैं।
Saturday, March 3, 2012
Friday, March 2, 2012
विद्यासागर नौटियाल
प्रेमचंद के बाद हमारे दौर में अगर कलम का कोई बडा सिपाही हुआ, तो वह विद्यासागर नौटियाल थे। जिन आदर्श और सिद्धांतों को उन्होंने कलम से लिखा उसे व्यवहारिक जीवन में भी जिया। बीए में पढने के दौरान ही उन्होंने भैंस का कट्टा जैसी कालजयी कहानी लिखी। हिंदी साहित्य में एक घास प्रेमचंद ने लिखी तो दूसरी घास नौटियाल ने। दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग और सामाजिक परिवेश की चुनौतियों को दर्शाने के साथ ही नैतिकता की नई भूमि तलाशते हैं। उनकी रचना भीम अकेला और उत्तर बायां हैं का मैं बडा प्रशंसक हूं।
विद्यासागर नौटियाल की लेखनी सदैव पीडितों और शोषितों के पक्ष में चलती रही। पहाडों के जीवन को उन्होंने अपनी रचना का प्रमुख विषय बनाया और उसे पोषित किया। पहाडों पर लिखते हुए वह न केवल जनसमस्याओं तक केंद्रित रहे बल्कि उसकी जमीनी हकीकत से हुक्मरानों को दो-चार कराते रहे। उनकी भाषा लोगों को आंदोलित करने वाली थी। उनकी राजनीति लाभ लेने के लिए नहीं, बल्कि जनसेवा के लिए थी। यही उनकी लेखनी में भी परिलक्षित होता है।
वह जितने प्रतिबद्ध, जुझारू और प्रगतिशील कम्युनिस्ट थे, उतने ही प्रतिबद्ध व समर्पित लेखक भी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन का नेतृत्व करते हुए वह डॉ. नामवर सिंह जैसे साहित्यकारों के संपर्क में आए। तब उनकी लिखी कहानी भैंस का कट्या बहुचर्चित व प्रसंशित हुई। इसके बाद उन्होंने पहाड के दुख-दर्द व वहां के संघर्ष को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उपन्यास उत्तर बायां है टिहरी के सामंती जीवन का मार्मिक आख्यान है। यह विरल है कि उन्होंने राजनीति के साथ गंभीर साहित्य भी रचा।
कथाकार विद्यासागर नौटियाल जितने साधारण और सरल थे, उतनी ही सादगी के कायल भी। बारहों महीने ठंडे पानी से स्नान करना उनकी दिनचर्या में शामिल था। हमेशा स्वस्थ रहने वाले नौटियाल पहली बार बीमार तब हुए, जब वह विधायक बने।
जब पहाड का साहित्य लिखा जाएगा, विद्यासागर नौटियाल का योगदान कोई भुला न पाएगा। वह कर्मठ, संघर्षशील नेता तो हिंदी के प्रभावशाली कथाकार थे। उनका जाना एक युग का बंद हो जाने सरीखा है। आजादी के ठीक बाद की युवा लेखकों की पीढी का एक सितारा टूट गया।
स्टूडेंट्स फेडरेशन आफ इंडिया को यहां खडा करने का श्रेय उन्हें जाता है। 1958-59 की बात है वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी हुआ करते थे। छात्र राजनीति में गहरी पैठ तो प्रभावशाली साहित्यकार के रूप में भी साख थी। इस बीच छात्रसंघ के सचिव चुने गए और विद्यार्थियों के मुद्दे पर आंदोलन छेड दिया। तीन माह संघर्ष चलता रहा इससे सरकार हिल गई। उन्हें मनाने को पहाड का होने के नाते गोविंद वल्लभ पंत को भेजा। आंदोलन खत्म करने की शर्त पर कांग्रेस में आमंत्रण व पद का प्रलोभन नौटियाल को डिगा न सका।
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विद्यासागर नौटियाल की लेखनी सदैव पीडितों और शोषितों के पक्ष में चलती रही। पहाडों के जीवन को उन्होंने अपनी रचना का प्रमुख विषय बनाया और उसे पोषित किया। पहाडों पर लिखते हुए वह न केवल जनसमस्याओं तक केंद्रित रहे बल्कि उसकी जमीनी हकीकत से हुक्मरानों को दो-चार कराते रहे। उनकी भाषा लोगों को आंदोलित करने वाली थी। उनकी राजनीति लाभ लेने के लिए नहीं, बल्कि जनसेवा के लिए थी। यही उनकी लेखनी में भी परिलक्षित होता है।
वह जितने प्रतिबद्ध, जुझारू और प्रगतिशील कम्युनिस्ट थे, उतने ही प्रतिबद्ध व समर्पित लेखक भी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन का नेतृत्व करते हुए वह डॉ. नामवर सिंह जैसे साहित्यकारों के संपर्क में आए। तब उनकी लिखी कहानी भैंस का कट्या बहुचर्चित व प्रसंशित हुई। इसके बाद उन्होंने पहाड के दुख-दर्द व वहां के संघर्ष को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उपन्यास उत्तर बायां है टिहरी के सामंती जीवन का मार्मिक आख्यान है। यह विरल है कि उन्होंने राजनीति के साथ गंभीर साहित्य भी रचा।
कथाकार विद्यासागर नौटियाल जितने साधारण और सरल थे, उतनी ही सादगी के कायल भी। बारहों महीने ठंडे पानी से स्नान करना उनकी दिनचर्या में शामिल था। हमेशा स्वस्थ रहने वाले नौटियाल पहली बार बीमार तब हुए, जब वह विधायक बने।
जब पहाड का साहित्य लिखा जाएगा, विद्यासागर नौटियाल का योगदान कोई भुला न पाएगा। वह कर्मठ, संघर्षशील नेता तो हिंदी के प्रभावशाली कथाकार थे। उनका जाना एक युग का बंद हो जाने सरीखा है। आजादी के ठीक बाद की युवा लेखकों की पीढी का एक सितारा टूट गया।
स्टूडेंट्स फेडरेशन आफ इंडिया को यहां खडा करने का श्रेय उन्हें जाता है। 1958-59 की बात है वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी हुआ करते थे। छात्र राजनीति में गहरी पैठ तो प्रभावशाली साहित्यकार के रूप में भी साख थी। इस बीच छात्रसंघ के सचिव चुने गए और विद्यार्थियों के मुद्दे पर आंदोलन छेड दिया। तीन माह संघर्ष चलता रहा इससे सरकार हिल गई। उन्हें मनाने को पहाड का होने के नाते गोविंद वल्लभ पंत को भेजा। आंदोलन खत्म करने की शर्त पर कांग्रेस में आमंत्रण व पद का प्रलोभन नौटियाल को डिगा न सका।
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Thursday, March 1, 2012
वक्त की बर्बादी अपराध है...
मां-बाप बच्चे के दोस्त बनें। उसे फ्री छोड़ दें। उसे राय दें , लेकिन कोई भी बात थोपें नहीं। उसके साथ क्वॉलिटी टाइम शेयर करें। बच्चे के साथ रहें। एक हफ्ते की छुट्टी ले लें और बच्चे के साथ टाइम बिताएं। कई बार मां-बाप दोनों काम पर चले जाते हैं और बच्चा घर में अकेला रह जाता है। ऐसे में अकेलेपन में उसे तमाम खराब खयाल आते हैं , चिंता उसके मन में घर करने लगती है और धीरे-धीरे उसे डिप्रेशन होने लगता है।
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समय के साथ दो बातें हमेशा ध्यान रखी जाएं, उसका आना और जाना। आते हुए समय की चुनौती को समझा जाए और गुजरते हुए वक्त के नुकसान को पकड़ा जाए। भारतीय संस्कृति ने तो समय को भी काल रूप में देव माना है। उसमें प्राण जैसी अनुभूति दी है।
समय को जीवनरूप में स्वीकार कर मान दिया है। आज का काम आज किया जाए, यह सिर्फ कहावत नहीं है, पूरा जीवन दर्शन है। कबीर ने अपनी एक पंक्ति में ‘पल में परलय’ शब्द का बहुत सही उपयोग किया है।
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब? आज की चूक एक बहुत बड़ा धक्का है। इसकी चोट जीवन के अंतिम समय तक असर करती है। यूं तो समय बहुत हल्का होता है, हौले-हौले गुजरता है।
शीतल और सुगंधित पवन की तरह समय भी आनंद देता बीत जाता है, लेकिन विलंब और टालने की वृत्ति आते ही अपने आप को भारी बना देता है और हर अगले दिन वह अपने भार को मल्टीपल कर लेता है। इसीलिए टाले हुए काम बोझ बनकर अशांत बनाते हैं। साथ ही हमारे व्यक्तित्व को अप्रिय व आलोचनापूर्ण बना देते हैं।
भारी समय अपने साथ अंधकार भी लाता है। वक्त की बर्बादी अपराध है। ऐसे लोग खुद का समय भी नष्ट करते हैं और दूसरे के समय का महत्व भी नहीं समझ पाते। यदि समय के मामले में स्फूर्त रहना है तो हर कार्य करने के पूर्व थोड़ा शांत होकर, विश्राम मुद्रा में अपने भीतर उतरें, एक गहरे प्रकाश को पकड़ने का प्रयास करें, जो हमारे भीतर होता ही है, फिर काम करें। भीतर उतरकर मौन साधना समय का सम्मान ही होता है।
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हमारा व्यवहार,संसार का व्यवहार है। दुनिया जैसा करती है,जैसा चाहती है,वैसा हम करने लगते हैं। इस मामले में जो लोग व्यवहारकुशल होते हैं,वे दुनिया में खूब कामयाब हो जाते हैं। इसी प्रकार हमारा स्वभाव परमात्मा का स्वभाव है।
इस बात को जितना हम ठीक से समझ लेंगे, उतना ही दूसरों के प्रति विनम्र और प्रेमपूर्ण हो जाएंगे। यह बहुत गहरा विचार है। हम यदि अपने स्वभाव को परमात्मा के स्वभाव से जोड़ लेते हैं तो वैसा ही अनुभव करने लगते हैं। आदमी वही बन जाता है जो वह अपने को मानता है। चूंकि हम एक विराट से अपने को जोड़कर रखते हैं, इसलिए हम भी विराट हो जाते हैं।
नास्तिक और आस्तिक में भेद ही यह है। आस्तिक हमेशा इसलिए मस्त रहेगा कि उसने भगवान में विश्वास ही नहीं किया है, उसने अपने आप को भगवान से जोड़ा भी है। नास्तिक के साथ आपत्ति यही है कि वह परमपिता के साथ अपने जुड़ाव को नकार देता है।
यहां मामला नैतिकता से अधिक स्वभाव का है। इसलिए स्वभाव के स्तर पर भगवान से जुड़े रहें। हम संसार में रहते हैं,परेशानियां आ ही जाती हैं,पर यदि हम भगवान से जुड़े हैं तो उस परेशानी,को गहराई में नहीं लाएंगे।
परेशानियां उतनी बड़ी नहीं होतीं,जितना मनुष्य खुद से जोड़कर उसको बड़ा बना देता है। यदि जुड़ाव परमशक्ति से है तो अपने आप संकटों से कटना हो जाएगा। हम संघर्षशील और पुरुषार्थी व्यक्ति होंगे,साथ में धार्मिक,विनम्र और विवेकशील भी रहेंगे।
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जीवन का दूसरा साहित्य है गीता। गीता महाभारत का एक छोटा सा हिस्सा है। जिस दिन 18 दिन का युद्ध आरंभ होने वाला था उस दिन अर्जुन थक गया तो भगवान ने पुन: अर्जुन को अपने कर्तव्य की ओर प्रेरित करने के लिए गीता का संदेश दिया था। केवल काम करने के लिए ही काम नहीं करना है। हर किए जा रहे काम के पीछे कर्तव्य, ईमानदारी और शत्प्रतिशत परिणाम लेने की तीव्र इच्छा होना चाहिए।
गीता यही सिखाती है। महाभारत युद्ध के ठीक पहले पाण्डवों के बड़ें भाई युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा था हम युद्ध हार जाएंगे, क्योंकि कौरवों के पक्ष में भीष्म, कर्ण और द्रौणाचार्य जैसे योद्धा हैं। हमारे पास क्या है? सेना भी कम है। तब अर्जुन ने समझाया था भैया युद्ध हम ही जीतेंगे, क्योंकि हमारे पास कृष्ण हैं यानी धर्म है। जहां धर्म, वहां जीत।
थोड़ी देर बाद युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण जो अर्जुन के सारथी थे, अर्जुन का रथ लेकर दोनों सेनाओं के बीच में पहुंचते हैं। अर्जुन ने जब कौरवों के पक्ष में अपने बुजुर्गों को देखा, रिश्तेदारों पर नजर डाली तो श्रीकृष्ण से कहने लगा मैं इस युद्ध को नहीं लड़ूंगा, इसमें मेरे अपने ही लोग मारे जाएंगे। तब कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं और इसी समझाइश से गीता का जन्म होता है।
कृष्ण ने कहा था मुद्दा यह नहीं है कि तुम युद्ध लड़ोगे या नहीं, हिंसा होगी या नहीं। सवाल यह है कि तुम्हारी इस निष्क्रियता से अधर्म और पाप को समर्थन मिल जाएगा। तुम्हारा कर्तव्य है गलत को रोकना और ध्यान रखो काम करते समय मैं कर रहा हूं यह भाव हटाओ, क्योंकि कर्म में यदि मैं आता है तो सफल होने पर अहंकार आ जाता है और असफल होने पर अवसाद (डिप्रेशन) आ जाता है। इसलिए शस्त्र उठाओ और युद्ध करो। तुम्हारा दायित्व है काम करना। सही काम करोगे तो परिणाम सही मिलेगा।
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जीवन का एक सच यह भी है कि आदमी अपनों के ही कारण अपनों से दूर हो जाता है। जब ऐसा हो तो फिर सारी प्रकृति अपनी हो जाती है। जीवन में प्रेम आते ही सारा दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। इस व्यापकता का नाम ही धर्म का सत्य स्वरूप है।
सच्चे धर्म का संबंध मनुष्य के सत्य के जानने से है। सच्चे धर्म की खोज मनुष्य के भीतर जो छुपा है, उसे पहचान लेने से है। मनुष्य के भीतर बहुत कुछ है। यदि नदी की तली में चट्टानें नहीं होतीं तो उसकी धाराओं में कोई संगीत भी नहीं होता।
इसी तरह मनुष्य के भीतर गहराई में उतरने पर अपनी ही पहचान का संगीत सुनाई देने लगता है। वह संगीत एक दफा पहचान लिया जाए तो वही पहचान अंत में परमात्मा की पहचान सिद्ध होती है। एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत लौटकर आया था।
उस राज्य के राजा ने संन्यासी से पूछा - क्या कहीं परमात्मा को खोज सके? संन्यासी ने उत्तर दिया - मैं इतना जान पाया हूं कि जिस दिन हम यह जान लेते हैं कि हम कौन हैं, उसी दिन हम परमात्मा को जान पाएंगे। न वह मूर्तियों में है, न वह नाम में है, न चित्र में है, न रूप में।
यह सब तो प्रवेशद्वार हैं, उन्हें लांघकर अंदर पहुंचना है। अध्यात्म मार्ग पर मन बहाने ढूंढ़ लेता है और बहाने वे कीलें होती हैं, जिनका उपयोग असफलता का मकान बनाने में होता है। फिर चाहे वह असफलता भौतिक जीवन में हो या भक्ति के जीवन में।
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आजकल कुछ भी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जिन्हें बिना संघर्ष के कुछ मिलता है, वे उसकी कीमत भी नहीं जान पाते। स्थितियों से संघर्ष करते-करते आदमी खुद से संघर्ष करने लगता है, फिर धीरे-धीरे अपनों से संघर्ष करने लग जाता है। यहीं से अपने और पराए का भेद शुरू हो जाता है।
नतीजा यह होता है कि सगे-संबंधियों में भेदभाव पैदा होकर घर टूट जाता है। इसलिए संघर्ष करने वालों को अपने भीतर अपनापन बनाए रखना चाहिए। अपनत्व का भाव जितना अधिक होगा, संघर्ष के दौरान संकीर्ण मनोवृत्ति उतनी ही कम होगी।
यदि ऐसा नहीं है तो जीवन में कलह का प्रवेश हो जाता है। परिवार टूटते हैं, सामाजिक एकता समाप्त होती है और देश की अखंडता पर भी इसका असर पड़ता है। इसलिए संघर्ष के दौर में अपनापन बनाए रखें।
हमारे भीतर अपनेपन की वृत्ति जागे, इसके लिए ईसाई महात्माओं का एक वचन याद रखना चाहिए - हर संत का एक अतीत होता है और हर पापी से एक भविष्य जुड़ा होता है। इस विचार को जीवन में उतारते ही हम समझ जाते हैं कि संत की स्तुति और पापी की निंदा करने में यह ध्यान रखें कि अपनेपन का भाव समाप्त न हो।
संतों की स्तुति इसलिए करते हैं कि हम उनके जैसा होना चाहते हैं और पापी की निंदा इसलिए करते हैं कि अपने अहंकार को तृप्ति मिले। अपनेपन का भाव आते ही हमारी दृष्टि बदल जाएगी और हम अपने संघर्ष को उत्सव का रूप दे सकेंगे।
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समय के साथ दो बातें हमेशा ध्यान रखी जाएं, उसका आना और जाना। आते हुए समय की चुनौती को समझा जाए और गुजरते हुए वक्त के नुकसान को पकड़ा जाए। भारतीय संस्कृति ने तो समय को भी काल रूप में देव माना है। उसमें प्राण जैसी अनुभूति दी है।
समय को जीवनरूप में स्वीकार कर मान दिया है। आज का काम आज किया जाए, यह सिर्फ कहावत नहीं है, पूरा जीवन दर्शन है। कबीर ने अपनी एक पंक्ति में ‘पल में परलय’ शब्द का बहुत सही उपयोग किया है।
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब? आज की चूक एक बहुत बड़ा धक्का है। इसकी चोट जीवन के अंतिम समय तक असर करती है। यूं तो समय बहुत हल्का होता है, हौले-हौले गुजरता है।
शीतल और सुगंधित पवन की तरह समय भी आनंद देता बीत जाता है, लेकिन विलंब और टालने की वृत्ति आते ही अपने आप को भारी बना देता है और हर अगले दिन वह अपने भार को मल्टीपल कर लेता है। इसीलिए टाले हुए काम बोझ बनकर अशांत बनाते हैं। साथ ही हमारे व्यक्तित्व को अप्रिय व आलोचनापूर्ण बना देते हैं।
भारी समय अपने साथ अंधकार भी लाता है। वक्त की बर्बादी अपराध है। ऐसे लोग खुद का समय भी नष्ट करते हैं और दूसरे के समय का महत्व भी नहीं समझ पाते। यदि समय के मामले में स्फूर्त रहना है तो हर कार्य करने के पूर्व थोड़ा शांत होकर, विश्राम मुद्रा में अपने भीतर उतरें, एक गहरे प्रकाश को पकड़ने का प्रयास करें, जो हमारे भीतर होता ही है, फिर काम करें। भीतर उतरकर मौन साधना समय का सम्मान ही होता है।
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हमारा व्यवहार,संसार का व्यवहार है। दुनिया जैसा करती है,जैसा चाहती है,वैसा हम करने लगते हैं। इस मामले में जो लोग व्यवहारकुशल होते हैं,वे दुनिया में खूब कामयाब हो जाते हैं। इसी प्रकार हमारा स्वभाव परमात्मा का स्वभाव है।
इस बात को जितना हम ठीक से समझ लेंगे, उतना ही दूसरों के प्रति विनम्र और प्रेमपूर्ण हो जाएंगे। यह बहुत गहरा विचार है। हम यदि अपने स्वभाव को परमात्मा के स्वभाव से जोड़ लेते हैं तो वैसा ही अनुभव करने लगते हैं। आदमी वही बन जाता है जो वह अपने को मानता है। चूंकि हम एक विराट से अपने को जोड़कर रखते हैं, इसलिए हम भी विराट हो जाते हैं।
नास्तिक और आस्तिक में भेद ही यह है। आस्तिक हमेशा इसलिए मस्त रहेगा कि उसने भगवान में विश्वास ही नहीं किया है, उसने अपने आप को भगवान से जोड़ा भी है। नास्तिक के साथ आपत्ति यही है कि वह परमपिता के साथ अपने जुड़ाव को नकार देता है।
यहां मामला नैतिकता से अधिक स्वभाव का है। इसलिए स्वभाव के स्तर पर भगवान से जुड़े रहें। हम संसार में रहते हैं,परेशानियां आ ही जाती हैं,पर यदि हम भगवान से जुड़े हैं तो उस परेशानी,को गहराई में नहीं लाएंगे।
परेशानियां उतनी बड़ी नहीं होतीं,जितना मनुष्य खुद से जोड़कर उसको बड़ा बना देता है। यदि जुड़ाव परमशक्ति से है तो अपने आप संकटों से कटना हो जाएगा। हम संघर्षशील और पुरुषार्थी व्यक्ति होंगे,साथ में धार्मिक,विनम्र और विवेकशील भी रहेंगे।
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जीवन का दूसरा साहित्य है गीता। गीता महाभारत का एक छोटा सा हिस्सा है। जिस दिन 18 दिन का युद्ध आरंभ होने वाला था उस दिन अर्जुन थक गया तो भगवान ने पुन: अर्जुन को अपने कर्तव्य की ओर प्रेरित करने के लिए गीता का संदेश दिया था। केवल काम करने के लिए ही काम नहीं करना है। हर किए जा रहे काम के पीछे कर्तव्य, ईमानदारी और शत्प्रतिशत परिणाम लेने की तीव्र इच्छा होना चाहिए।
गीता यही सिखाती है। महाभारत युद्ध के ठीक पहले पाण्डवों के बड़ें भाई युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा था हम युद्ध हार जाएंगे, क्योंकि कौरवों के पक्ष में भीष्म, कर्ण और द्रौणाचार्य जैसे योद्धा हैं। हमारे पास क्या है? सेना भी कम है। तब अर्जुन ने समझाया था भैया युद्ध हम ही जीतेंगे, क्योंकि हमारे पास कृष्ण हैं यानी धर्म है। जहां धर्म, वहां जीत।
थोड़ी देर बाद युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण जो अर्जुन के सारथी थे, अर्जुन का रथ लेकर दोनों सेनाओं के बीच में पहुंचते हैं। अर्जुन ने जब कौरवों के पक्ष में अपने बुजुर्गों को देखा, रिश्तेदारों पर नजर डाली तो श्रीकृष्ण से कहने लगा मैं इस युद्ध को नहीं लड़ूंगा, इसमें मेरे अपने ही लोग मारे जाएंगे। तब कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं और इसी समझाइश से गीता का जन्म होता है।
कृष्ण ने कहा था मुद्दा यह नहीं है कि तुम युद्ध लड़ोगे या नहीं, हिंसा होगी या नहीं। सवाल यह है कि तुम्हारी इस निष्क्रियता से अधर्म और पाप को समर्थन मिल जाएगा। तुम्हारा कर्तव्य है गलत को रोकना और ध्यान रखो काम करते समय मैं कर रहा हूं यह भाव हटाओ, क्योंकि कर्म में यदि मैं आता है तो सफल होने पर अहंकार आ जाता है और असफल होने पर अवसाद (डिप्रेशन) आ जाता है। इसलिए शस्त्र उठाओ और युद्ध करो। तुम्हारा दायित्व है काम करना। सही काम करोगे तो परिणाम सही मिलेगा।
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जीवन का एक सच यह भी है कि आदमी अपनों के ही कारण अपनों से दूर हो जाता है। जब ऐसा हो तो फिर सारी प्रकृति अपनी हो जाती है। जीवन में प्रेम आते ही सारा दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। इस व्यापकता का नाम ही धर्म का सत्य स्वरूप है।
सच्चे धर्म का संबंध मनुष्य के सत्य के जानने से है। सच्चे धर्म की खोज मनुष्य के भीतर जो छुपा है, उसे पहचान लेने से है। मनुष्य के भीतर बहुत कुछ है। यदि नदी की तली में चट्टानें नहीं होतीं तो उसकी धाराओं में कोई संगीत भी नहीं होता।
इसी तरह मनुष्य के भीतर गहराई में उतरने पर अपनी ही पहचान का संगीत सुनाई देने लगता है। वह संगीत एक दफा पहचान लिया जाए तो वही पहचान अंत में परमात्मा की पहचान सिद्ध होती है। एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत लौटकर आया था।
उस राज्य के राजा ने संन्यासी से पूछा - क्या कहीं परमात्मा को खोज सके? संन्यासी ने उत्तर दिया - मैं इतना जान पाया हूं कि जिस दिन हम यह जान लेते हैं कि हम कौन हैं, उसी दिन हम परमात्मा को जान पाएंगे। न वह मूर्तियों में है, न वह नाम में है, न चित्र में है, न रूप में।
यह सब तो प्रवेशद्वार हैं, उन्हें लांघकर अंदर पहुंचना है। अध्यात्म मार्ग पर मन बहाने ढूंढ़ लेता है और बहाने वे कीलें होती हैं, जिनका उपयोग असफलता का मकान बनाने में होता है। फिर चाहे वह असफलता भौतिक जीवन में हो या भक्ति के जीवन में।
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आजकल कुछ भी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जिन्हें बिना संघर्ष के कुछ मिलता है, वे उसकी कीमत भी नहीं जान पाते। स्थितियों से संघर्ष करते-करते आदमी खुद से संघर्ष करने लगता है, फिर धीरे-धीरे अपनों से संघर्ष करने लग जाता है। यहीं से अपने और पराए का भेद शुरू हो जाता है।
नतीजा यह होता है कि सगे-संबंधियों में भेदभाव पैदा होकर घर टूट जाता है। इसलिए संघर्ष करने वालों को अपने भीतर अपनापन बनाए रखना चाहिए। अपनत्व का भाव जितना अधिक होगा, संघर्ष के दौरान संकीर्ण मनोवृत्ति उतनी ही कम होगी।
यदि ऐसा नहीं है तो जीवन में कलह का प्रवेश हो जाता है। परिवार टूटते हैं, सामाजिक एकता समाप्त होती है और देश की अखंडता पर भी इसका असर पड़ता है। इसलिए संघर्ष के दौर में अपनापन बनाए रखें।
हमारे भीतर अपनेपन की वृत्ति जागे, इसके लिए ईसाई महात्माओं का एक वचन याद रखना चाहिए - हर संत का एक अतीत होता है और हर पापी से एक भविष्य जुड़ा होता है। इस विचार को जीवन में उतारते ही हम समझ जाते हैं कि संत की स्तुति और पापी की निंदा करने में यह ध्यान रखें कि अपनेपन का भाव समाप्त न हो।
संतों की स्तुति इसलिए करते हैं कि हम उनके जैसा होना चाहते हैं और पापी की निंदा इसलिए करते हैं कि अपने अहंकार को तृप्ति मिले। अपनेपन का भाव आते ही हमारी दृष्टि बदल जाएगी और हम अपने संघर्ष को उत्सव का रूप दे सकेंगे।
Wednesday, February 29, 2012
मदद के लिए सदैव तैयार रहने वाले को ही समाज में प्रतिष्ठा हासिल होती है.....
वर्तमान दौर की युवा पीढ़ी मुझे ज्यादा ऊर्जावान लगती है। ये खुद को ज्यादा अच्छे से प्रस्तुत करते हैं। पुराने समय के बच्चों की तुलना में आज के बच्चे ज्यादा प्रोफेशनल भी हैं। अगर संगीत के क्षेत्र की बात की जाए, तो इसमें भी मुझे बहुत ज्यादा उत्साही युवक दिखाई पड़ते हैं, लेकिन इनके साथ समस्या एक ही है। इनमें नतीजे की जल्दी है। ये हर चीज जल्दी पाना चाहते हैं। सामान्यत: पैसा-प्रसिद्धि की चाह सभी को रहती है और यह सब समय आने पर मिलता भी है, लेकिन बड़े कलाकार जैसा पहनते हैं या जैसा करते हैं- वैसा करने की कोशिश कहां तक सही है? व्यक्ति को अपनी हैसियत पता होनी चाहिए। युवाओं के साथ यही परेशानी है कि बजाय रियाज करने के, उनका ध्यान धन-शोहरत पाने पर रहता है। ......हरिप्रसाद चौरसिया
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एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन शहर का जायजा लेने निकले। रास्ते में एक जगह इमारत बन रही थी। वह कुछ देर रुक गए और निर्माण कार्य को गौर से देखने लगे। उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठाकर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। पत्थर बहुत ही भारी था, इतने मजदूरों से भी उठ नहीं पा रहा था। पास खड़ा ठेकेदार मजदूरों को पत्थर न उठा पाने के लिए डांट रहा था। वॉशिंगटन ने ठेकेदार के पास जाकर कहा, ‘मजदूरों की मदद करो। एक और आदमी अपना हाथ लगा दे तो शायद पत्थर उठ जाएगा।’ ठेकेदार वॉशिंगटन को पहचान नहीं पाया और रौब से बोला, ‘मैं दूसरों से
काम लेता हूं, मैं मजदूरी नहीं करता।’ यह जवाब सुनकर वॉशिंगटन घोड़े से उतरे और पत्थर उठाने में मजदूरों की मदद करने लगे। उनके सहारा देते ही पत्थर उठ गया और आसानी से ऊपर चला गया। अब वॉशिंगटन वापस अपने घोड़े पर आकर बैठ गए और बोले, ‘सलाम ठेकेदार साहब, भविष्य में कभी आपको एक व्यक्ति की कमी मालूम पड़े तो राष्ट्रपति भवन में आकर जॉर्ज वॉशिंगटन को याद कर लेना।’ यह सुनते ही ठेकेदार राष्ट्रपति के पैरों पर गिर पड़ा और अपने र्दुव्यवहार के लिए क्षमा मांगने लगा। वॉशिंगटन ने उससे विनम्रता से कहा, ‘मेहनत करने से कोई भी आदमी छोटा या बड़ा नहीं हो जाता। मजदूरों की मदद करने से तुम उनका सम्मान हासिल करोगे।
याद रखो, मदद के लिए सदैव तैयार रहने वाले को ही समाज में प्रतिष्ठा हासिल होती है। इसलिए जीवन में ऊंचाइयां हासिल करने के लिए व्यवहार में विनम्रता का होना
बेहद जरूरी है।’ उस दिन के बाद से ठेकेदार के व्यवहार में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आया। वह सभी के साथ अत्यंत नम्रता से पेश आने लगा।
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लोग गुरुमंत्र तो लेते हैं लेकिन अक्सर उसके पीछे अपनी शंकाएं भी चिपका देते हैं। मन में अविश्वास का भाव आया कि मंत्र का असर ख़त्म हुआ समझिए। मन का विश्वास ही एक साधारण से मंत्र को चमत्कारी बना सकता है। अगर गुरु से मंत्र दीक्षा में लिया है तो उसमे पूरा भरोसा रखिये। विश्वास से बड़ा कोई मंत्र नहीं है।
शंका करना मन का स्वभाव होता है। किसी पर अविश्वास करके मन बड़ा प्रसन्न रहता है। इसीलिए लोग गुरु के शब्दों में भी संदेह ढूंढ़ते हैं। सिद्ध गुरु आरंभ में शब्द ऐसे बोलते हैं कि मन के द्वार बंद न हो जाएं। गुरुमंत्र में ऐसा प्रभाव होता है कि वह मन में प्रवेश करता है और फिर धीरे-धीरे उसकी सफाई करता है।
शक्तिपात गुरु स्वामी शिवोमतीर्थजी महाराज कहा करते थे कि मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा विकसित हो गया है कि वह हर बात में शंका करता है। उससे कोई कितनी भी सहानुभूति करे, वह उसमें भी संशय करता है। अध्यात्म के विषय में उसने केवल सुना ही सुना है, अनुभव नहीं किया। इसलिए इस संबंध में वह और भी अधिक शंकालु हो गया है।
जब तक उसके मन में गुरु वचनों पर दृढ़ श्रद्धा नहीं होती, अंतर की शंका नीचे नहीं दबती। गुरु इस बात से अच्छी तरह परिचित होते हैं। अत: वह अपनी कृपा से शिष्य को चेतना शक्ति की जागृति का प्रत्यक्ष अनुभव करा देते हैं। चित्त में एक चिंगारी सुलग उठती है, जो आध्यात्मिक जागृति के लिए बीज का काम करती है।
सूर्य के फैलने वाले प्रकाश के पूर्व किरण होती है, जिससे साधक को ज्ञात हो जाता है कि चित्त में चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश होने वाला है, जिससे उसके मन में गुरु के प्रति, साधन के प्रति, अनुभव के प्रति श्रद्धा पैदा हो उठती है। श्रद्धा ही साधन का आधार है तथा सभी शंकाओं को दूर करने में मददगार है। श्रद्धा को केवल कर्मकांड से बलवती नहीं बनाया जा सकता, इसके लिए ध्यान बहुत जरूरी है। लगातार ध्यान करने से जो अनुभव होते हैं, उससे श्रद्धा परिष्कृत होती है।
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बोलना और सुनना हमारी फितरत में शामिल है। कुछ लोगों को बोलने की बीमारी-सी हो जाती है। इसी तरह सुनने का भी नशा होता है। जब सुनने की इच्छा खूब होने लगती है तो आदमी दूसरों की बातों में रुचि लेने लगता है। क्या सुना जाए, भक्ति के क्षेत्र में यह भी आवश्यक है, क्योंकि हमारे जीवन में और इस ब्रहांड में बहुत कुछ अनसुना भी मौजूद है।
भजन, कीर्तन आध्यात्मिक प्रतिध्वनि होते हैं। इनके बोल जागरूकता के लिए प्रेरक बन जाते हैं। जिन्हें शांति की तलाश हो, वे अपने श्रवण, रुचि और क्षमता पर थोड़ा ध्यान दें।
ऐसा न सुनें, जो आवश्यक न हो और ऐसा जरूर सुनें, जो हमें और गहराई में ले जाए। इसलिए मेडिटेशन के समय शास्त्रीय संगीत की कुछ धुनें बड़ी काम आती हैं। कभी-कभी तो हमें ऐसा लगता है, जैसे ये स्वर हमें हौले-हौले हमारे ही भीतर गहरे ले जा रहे हों।
अंदर जाते समय जरा भी लड़खड़ाहट हो तो संगीत हमें संभाल लेता है। इसे ही साउंड ऑफ साइलेंस कहेंगे। थोड़ा समय इसे सुनने का प्रयास करें, क्योंकि हम सब शून्य से घबराते हैं। थोड़ा समय आंखें बंद करके जब बैठेंगे तो जो मौन, शून्य भीतर घटता है, उससे घबराहट होगी, क्योंकि आंखें बंद करते ही अंधेरा छा जाता है और अंधेरे में जैसे हम चलते समय किसी भी चीज से टकराते हैं, वैसे ही भीतर के अंधेरे में भी हड़बड़ाहट शुरू होती है।
थोड़ा-थोड़ा अभ्यास रोज करें। थोड़ी देर अधिक अंधेरे में रहो तो उस स्थान पर चलने का अभ्यास हो जाता है। आंखें बंद हों और कानों से कुछ ऐसा सुनें, जो हमें अपने ही भीतर उस अनसुने की ओर ले जाएगा, जिसे सुनकर गहरी शांति मिलेगी।
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कहना आसान है कि कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो। पहले तो इसी पंक्ति में संशोधन कर लें। फल की चिंता जरूर करें, क्योंकि बिना चिंता पाले कर्म की योजना, कर्म में परिश्रम नहीं हो पाएगा। इतना जरूर ध्यान रखें कि फल में आसक्ति न हो। दिक्कत आसक्ति से शुरू होती है, लेकिन ऐसा करना भी कठिन मालूम पड़ता है।
आजकल तो पहले फल निर्धारित किया जाता है, फिर आदमी कर्म करता है। इसीलिए जब उसे वांछित फल नहीं मिलता, तब वह परेशान होता है। फल की आसक्ति से मुक्त होने के लिए हमें अपने मनुष्य होने की रचना को समझना होगा। हम दो बातों से मिलकर बने हैं, दैवीय तत्व और भौतिक तत्व।
हमारी आत्मा दैवीय तत्व का हिस्सा है, मन भौतिक तत्व से जुड़ा है और तन इन दोनों का मिश्रण है। मन का स्वभाव है कि उसे सबकुछ चाहिए, बेलगाम चाहिए। इसीलिए मन या तो भविष्य की सोचता है या भूतकाल की, उसे वर्तमान में रुचि नहीं है। यह तमोगुणी स्वभाव है। आत्मा के भी तीन गुण होते हैं, जिन्हें सत्, चित् और आनंद कहा गया है।
जैसे मछली को जल में रहना ही प्रिय है, वैसे ही आत्मा आनंद में ही रहती है। जो आनंद में रहता है, वह भविष्य में फल की आसक्ति नहीं करता। इसलिए कर्म करते समय शरीर पूरा परिश्रम करे, लेकिन हम आत्मा की ओर मुड़े रहें, केवल मन पर न टिकें। और इसीलिए योगियों ने ध्यान को महत्व दिया है। ध्यान का अर्थ है वर्तमान पर टिकना। कई लोग पूछते हैं - क्या ध्यान करने से शांति मिलेगी? यह प्रश्न ही ध्यान में बाधा है। आप सिर्फ क्रिया करिए और अपने आप वह मिलेगा, जो सही है।
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एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन शहर का जायजा लेने निकले। रास्ते में एक जगह इमारत बन रही थी। वह कुछ देर रुक गए और निर्माण कार्य को गौर से देखने लगे। उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठाकर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। पत्थर बहुत ही भारी था, इतने मजदूरों से भी उठ नहीं पा रहा था। पास खड़ा ठेकेदार मजदूरों को पत्थर न उठा पाने के लिए डांट रहा था। वॉशिंगटन ने ठेकेदार के पास जाकर कहा, ‘मजदूरों की मदद करो। एक और आदमी अपना हाथ लगा दे तो शायद पत्थर उठ जाएगा।’ ठेकेदार वॉशिंगटन को पहचान नहीं पाया और रौब से बोला, ‘मैं दूसरों से
काम लेता हूं, मैं मजदूरी नहीं करता।’ यह जवाब सुनकर वॉशिंगटन घोड़े से उतरे और पत्थर उठाने में मजदूरों की मदद करने लगे। उनके सहारा देते ही पत्थर उठ गया और आसानी से ऊपर चला गया। अब वॉशिंगटन वापस अपने घोड़े पर आकर बैठ गए और बोले, ‘सलाम ठेकेदार साहब, भविष्य में कभी आपको एक व्यक्ति की कमी मालूम पड़े तो राष्ट्रपति भवन में आकर जॉर्ज वॉशिंगटन को याद कर लेना।’ यह सुनते ही ठेकेदार राष्ट्रपति के पैरों पर गिर पड़ा और अपने र्दुव्यवहार के लिए क्षमा मांगने लगा। वॉशिंगटन ने उससे विनम्रता से कहा, ‘मेहनत करने से कोई भी आदमी छोटा या बड़ा नहीं हो जाता। मजदूरों की मदद करने से तुम उनका सम्मान हासिल करोगे।
याद रखो, मदद के लिए सदैव तैयार रहने वाले को ही समाज में प्रतिष्ठा हासिल होती है। इसलिए जीवन में ऊंचाइयां हासिल करने के लिए व्यवहार में विनम्रता का होना
बेहद जरूरी है।’ उस दिन के बाद से ठेकेदार के व्यवहार में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आया। वह सभी के साथ अत्यंत नम्रता से पेश आने लगा।
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लोग गुरुमंत्र तो लेते हैं लेकिन अक्सर उसके पीछे अपनी शंकाएं भी चिपका देते हैं। मन में अविश्वास का भाव आया कि मंत्र का असर ख़त्म हुआ समझिए। मन का विश्वास ही एक साधारण से मंत्र को चमत्कारी बना सकता है। अगर गुरु से मंत्र दीक्षा में लिया है तो उसमे पूरा भरोसा रखिये। विश्वास से बड़ा कोई मंत्र नहीं है।
शंका करना मन का स्वभाव होता है। किसी पर अविश्वास करके मन बड़ा प्रसन्न रहता है। इसीलिए लोग गुरु के शब्दों में भी संदेह ढूंढ़ते हैं। सिद्ध गुरु आरंभ में शब्द ऐसे बोलते हैं कि मन के द्वार बंद न हो जाएं। गुरुमंत्र में ऐसा प्रभाव होता है कि वह मन में प्रवेश करता है और फिर धीरे-धीरे उसकी सफाई करता है।
शक्तिपात गुरु स्वामी शिवोमतीर्थजी महाराज कहा करते थे कि मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा विकसित हो गया है कि वह हर बात में शंका करता है। उससे कोई कितनी भी सहानुभूति करे, वह उसमें भी संशय करता है। अध्यात्म के विषय में उसने केवल सुना ही सुना है, अनुभव नहीं किया। इसलिए इस संबंध में वह और भी अधिक शंकालु हो गया है।
जब तक उसके मन में गुरु वचनों पर दृढ़ श्रद्धा नहीं होती, अंतर की शंका नीचे नहीं दबती। गुरु इस बात से अच्छी तरह परिचित होते हैं। अत: वह अपनी कृपा से शिष्य को चेतना शक्ति की जागृति का प्रत्यक्ष अनुभव करा देते हैं। चित्त में एक चिंगारी सुलग उठती है, जो आध्यात्मिक जागृति के लिए बीज का काम करती है।
सूर्य के फैलने वाले प्रकाश के पूर्व किरण होती है, जिससे साधक को ज्ञात हो जाता है कि चित्त में चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश होने वाला है, जिससे उसके मन में गुरु के प्रति, साधन के प्रति, अनुभव के प्रति श्रद्धा पैदा हो उठती है। श्रद्धा ही साधन का आधार है तथा सभी शंकाओं को दूर करने में मददगार है। श्रद्धा को केवल कर्मकांड से बलवती नहीं बनाया जा सकता, इसके लिए ध्यान बहुत जरूरी है। लगातार ध्यान करने से जो अनुभव होते हैं, उससे श्रद्धा परिष्कृत होती है।
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बोलना और सुनना हमारी फितरत में शामिल है। कुछ लोगों को बोलने की बीमारी-सी हो जाती है। इसी तरह सुनने का भी नशा होता है। जब सुनने की इच्छा खूब होने लगती है तो आदमी दूसरों की बातों में रुचि लेने लगता है। क्या सुना जाए, भक्ति के क्षेत्र में यह भी आवश्यक है, क्योंकि हमारे जीवन में और इस ब्रहांड में बहुत कुछ अनसुना भी मौजूद है।
भजन, कीर्तन आध्यात्मिक प्रतिध्वनि होते हैं। इनके बोल जागरूकता के लिए प्रेरक बन जाते हैं। जिन्हें शांति की तलाश हो, वे अपने श्रवण, रुचि और क्षमता पर थोड़ा ध्यान दें।
ऐसा न सुनें, जो आवश्यक न हो और ऐसा जरूर सुनें, जो हमें और गहराई में ले जाए। इसलिए मेडिटेशन के समय शास्त्रीय संगीत की कुछ धुनें बड़ी काम आती हैं। कभी-कभी तो हमें ऐसा लगता है, जैसे ये स्वर हमें हौले-हौले हमारे ही भीतर गहरे ले जा रहे हों।
अंदर जाते समय जरा भी लड़खड़ाहट हो तो संगीत हमें संभाल लेता है। इसे ही साउंड ऑफ साइलेंस कहेंगे। थोड़ा समय इसे सुनने का प्रयास करें, क्योंकि हम सब शून्य से घबराते हैं। थोड़ा समय आंखें बंद करके जब बैठेंगे तो जो मौन, शून्य भीतर घटता है, उससे घबराहट होगी, क्योंकि आंखें बंद करते ही अंधेरा छा जाता है और अंधेरे में जैसे हम चलते समय किसी भी चीज से टकराते हैं, वैसे ही भीतर के अंधेरे में भी हड़बड़ाहट शुरू होती है।
थोड़ा-थोड़ा अभ्यास रोज करें। थोड़ी देर अधिक अंधेरे में रहो तो उस स्थान पर चलने का अभ्यास हो जाता है। आंखें बंद हों और कानों से कुछ ऐसा सुनें, जो हमें अपने ही भीतर उस अनसुने की ओर ले जाएगा, जिसे सुनकर गहरी शांति मिलेगी।
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कहना आसान है कि कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो। पहले तो इसी पंक्ति में संशोधन कर लें। फल की चिंता जरूर करें, क्योंकि बिना चिंता पाले कर्म की योजना, कर्म में परिश्रम नहीं हो पाएगा। इतना जरूर ध्यान रखें कि फल में आसक्ति न हो। दिक्कत आसक्ति से शुरू होती है, लेकिन ऐसा करना भी कठिन मालूम पड़ता है।
आजकल तो पहले फल निर्धारित किया जाता है, फिर आदमी कर्म करता है। इसीलिए जब उसे वांछित फल नहीं मिलता, तब वह परेशान होता है। फल की आसक्ति से मुक्त होने के लिए हमें अपने मनुष्य होने की रचना को समझना होगा। हम दो बातों से मिलकर बने हैं, दैवीय तत्व और भौतिक तत्व।
हमारी आत्मा दैवीय तत्व का हिस्सा है, मन भौतिक तत्व से जुड़ा है और तन इन दोनों का मिश्रण है। मन का स्वभाव है कि उसे सबकुछ चाहिए, बेलगाम चाहिए। इसीलिए मन या तो भविष्य की सोचता है या भूतकाल की, उसे वर्तमान में रुचि नहीं है। यह तमोगुणी स्वभाव है। आत्मा के भी तीन गुण होते हैं, जिन्हें सत्, चित् और आनंद कहा गया है।
जैसे मछली को जल में रहना ही प्रिय है, वैसे ही आत्मा आनंद में ही रहती है। जो आनंद में रहता है, वह भविष्य में फल की आसक्ति नहीं करता। इसलिए कर्म करते समय शरीर पूरा परिश्रम करे, लेकिन हम आत्मा की ओर मुड़े रहें, केवल मन पर न टिकें। और इसीलिए योगियों ने ध्यान को महत्व दिया है। ध्यान का अर्थ है वर्तमान पर टिकना। कई लोग पूछते हैं - क्या ध्यान करने से शांति मिलेगी? यह प्रश्न ही ध्यान में बाधा है। आप सिर्फ क्रिया करिए और अपने आप वह मिलेगा, जो सही है।
Monday, February 20, 2012
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)
- कृषि और समवर्गी क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश में वृद्धि करने के लिए राज्यों को प्रोत्साहित करना,
- राज्यों को कृषि और समवर्गी क्षेत्र की योजनाओं के नियोजन व निष्पादन की प्रक्रिया में लचीलापन तथा स्वायतता प्रदान करना,
- कृषि-जलवायुवीय स्थितियाँ, प्रौद्योगिकी तथा प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर जिलों और राज्यों के लिए कृषि योजनाएँ तैयार किया जाना सुनिश्चित करना,
- यह सुनिश्चित करना कि राज्यों की कृषि योजनाओं में स्थानीय जरूरतों/फसलों/ प्राथमिकताओं को बेहतर रूप से प्रतिबिंबित किया जाए,
- केन्द्रक हस्तक्षेपों के माध्यम से महत्वपूर्ण फसलों में उपज अंतर को कम करने का लक्ष्य प्राप्त करना,
- कृषि और समवर्गी क्षेत्रों में किसानों की आय को अधिकतम करना, और
- कृषि और समवर्गी क्षेत्रों के विभिन्न घटकों का समग्र ढंग से समाधान करके उनके उत्पादन और उत्पादकता में मात्रात्मक परिवर्तन करना।
- गेहूँ, धान, मोटे अनाज, छोटे कदन्न, दालों, तिलहनों जैसी प्रमुख खाद्य फसलों का समेकित विकास,
- कृषि यंत्रीकरण,
- मृदा स्वास्थ्य के संवर्धन से संबंधित क्रियाकलाप,
- पनधारा क्षेत्रों के अन्दर तथा बाहर वर्षा सिंचित फार्मिंग प्रणाली का विकास और साथ ही पनधारा क्षेत्रों, बंजर भूमियों, नदी घाटियों का समेकित विकास,
- राज्य बीज फार्मों को सहायता,
- समेकित कीट प्रबंधन योजनाएँ,
- गैर फार्म क्रियाकलापों को बढ़ावा देना,
- मण्डी अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण तथा मण्डी विकास,
- विस्तार सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए अवसंरचना को मजबूत बनाना,
- बागवानी उत्पादन को बढ़ावा देने संबंधी क्रियाकलाप तथा सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को लोकप्रिय बनाना,
- पशुपालन एवं मात्स्यिकी विकाय क्रियाकलाप,
- भूमि सुधारों के लाभानुभोगियों के लिए विशेष योजनाएँ,
- परियोजनाओं की पूर्णता की अवधारणा शुरू करना,
- कृषि/बागवानी को बढ़ावा देने वाले राज्य सरकार के संस्थाओं को अनुदान सहायता,
- किसानों के अध्ययन दौरे,
- कार्बनिक तथा जैव-उर्वरक एवं
- अभिनव योजनाएँ।
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत वित्त पोषण की पात्रता के लिए सरकार ने रेशम उत्पादन और सम्बद्ध गतिविधियों का RKVY के तहत समावेश का फैसला किया है। इसमें रेशम कीट के उत्पादन के चरण तक रेशम उत्पादन शामिल रहेगा और साथ ही कृषि उद्यम में रेशम कीट के उत्पादन व रेशम धागे के उत्पादन से लेकर विपणन तक विस्तार प्रणाली भी।
अब RKVY का लाभ रेशम उत्पादन विस्तार प्रणाली में सुधार, मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर करने, वर्षा से पोषित रेशम उद्योग को विकसित करने तथा एकीकृत कीट प्रबंधन के लिए में लिया जा सकता है। लाभ रेशम के कीड़ों के बीज बेहतर करने तथा क्षेत्र के मशीनीकरण के लिए होंगे। यह निर्णय बाजार के बुनियादी ढांचे के विकास तथा सेरी उद्यम को बढ़ावा देने में सहायता प्रदान करेगा। गैर कृषि गतिविधियों के लिए परियोजनाएं हाथ में ली जा सकती हैं और भूमि सुधार के लाभार्थियों जैसे सीमांत व छोटे किसानों आदि को विशेष योजनाएं स्वीकृत कर रेशम कीट पालन किसान को अधिकतम लाभ दिया जा सकता है।
Tuesday, February 14, 2012
साहित्य अकादेमी पुरस्कार-2011
वर्ष 2011 के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्रदान किये गये। इस अवसर पर 22 प्रख्यात लेखकों और कवियों को इन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। स्वर्गीय कबिन फुकन (असमी), मणिन्द्र गुप्ता (बंगाली), प्रेमानंद मुसाहरी (बोडो), नसीम शफी (कश्मीरी), मेलवीन रॉड्रिग्स (कोंकणी), हरेकृष्ण सतपथी (संस्कृत), आदित्य कुमार मंडी (संथाली) और खलील मामून (उर्दू) इन पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं में शामिल हैं।
प्रख्यात उपन्यासकार काशीनाथ सिंह (हिन्दी), गोपालकृष्ण पाई (कन्नड), क्षेत्री बीरा (मणिपुरी), कल्पना कुमारी देवी (उडि़या), बलदेव सिंह (पंजाबी), अतुल कनक ( राजस्थानी) और एस. वेंकटेशन (तमिल) ने भी पुरस्कार प्राप्त किये।
ललित मगोत्रा (ढोगरी), ग्रेस (मराठी) और सामला सदाशिव (तेलूगु) लेखों की उनकी पुस्तकों के लिए पुरस्कृत किया गया।
रामचन्द्र गुहा (अंग्रेजी) को विवरणात्मक इतिहास की उनकी पुस्तक के लिए, मोहन परमार (गुजराती) को लघुकथा की उनकी पुस्तक के लिए, एन के सानू, (मलयालम) को जीवनी की उनकी पुस्तक के लिए और मोहन गेहानी (सिंधी) को नाटकों की उनकी पुस्तक के लिेए पुरस्कृत किया गया है। मैथिली भाषा के लिए पुरस्कार की घोषणा होना अभी तक बाकी है।
साहित्य अकादेमी की ओर से आयोजित साहित्योत्सव के दौरान एक विशेष कार्यक्रम में इन पुस्तकों के लेखकों को पुरस्कार स्वरूप ताम्रफलक से उत्कीर्ण एक मंजूषा, एक चादर और एक लाख रुपये का एक चैक भेंट किया गया। इस अवसर पर हिन्दी के प्रख्यात व्यंग्यकार प्रोफेसर नामवर सिंह मुख्य अतिथि और साहित्य अकादेमी प्रेमचंद फेलो सुमती शिवमोहन सम्मानित अतिथि थे।
प्रख्यात उपन्यासकार काशीनाथ सिंह (हिन्दी), गोपालकृष्ण पाई (कन्नड), क्षेत्री बीरा (मणिपुरी), कल्पना कुमारी देवी (उडि़या), बलदेव सिंह (पंजाबी), अतुल कनक ( राजस्थानी) और एस. वेंकटेशन (तमिल) ने भी पुरस्कार प्राप्त किये।
ललित मगोत्रा (ढोगरी), ग्रेस (मराठी) और सामला सदाशिव (तेलूगु) लेखों की उनकी पुस्तकों के लिए पुरस्कृत किया गया।
रामचन्द्र गुहा (अंग्रेजी) को विवरणात्मक इतिहास की उनकी पुस्तक के लिए, मोहन परमार (गुजराती) को लघुकथा की उनकी पुस्तक के लिए, एन के सानू, (मलयालम) को जीवनी की उनकी पुस्तक के लिए और मोहन गेहानी (सिंधी) को नाटकों की उनकी पुस्तक के लिेए पुरस्कृत किया गया है। मैथिली भाषा के लिए पुरस्कार की घोषणा होना अभी तक बाकी है।
साहित्य अकादेमी की ओर से आयोजित साहित्योत्सव के दौरान एक विशेष कार्यक्रम में इन पुस्तकों के लेखकों को पुरस्कार स्वरूप ताम्रफलक से उत्कीर्ण एक मंजूषा, एक चादर और एक लाख रुपये का एक चैक भेंट किया गया। इस अवसर पर हिन्दी के प्रख्यात व्यंग्यकार प्रोफेसर नामवर सिंह मुख्य अतिथि और साहित्य अकादेमी प्रेमचंद फेलो सुमती शिवमोहन सम्मानित अतिथि थे।
Saturday, January 28, 2012
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